गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

तुम्हारा साथ हमने खो के जाना

तुम्हारा साथ हमने खो के जाना,
तुम्हारा साथ था कितना ज़रूरी

रहेगा फ़र्क क्या औरों में तुम में,
जो तुमसे भी रहें बातें अधूरी,

किसी दिन राय अपनी भी तो रखो ( रखिए )
करोगे कब तलक ये जी हुज़ूरी (करेंगे )

नहीं हो पाए तो फिर छोड़ देना,
कोई भी शय नहीं तुमसे ज़रूरी,

निगाहों में जो इतनी बेकली है,
कोई तो बात है लब पर अधूरी,

थे कैसे फा़सले जो मिट न पाए,
रही कुर्बत में भी एक आला दूरी,( अनजानी दूरी )

गुज़ारा कर रहे हैं करने वाले,
लिए दिल में कई ख़्वाहिश अधूरी।

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