सोमवार, 29 सितंबर 2025

हवा हो ज़िद पे तो क्या कश्ती बढ़ाए रखिये,

ग़ज़ल

हवा हो ज़िद पे तो क्या कश्ती बढ़ाए रखिये,
तीरगी लाख़ सही शम्मा जलाए रखिए ,

मिलेंगे आड़ में मरहम के कई ज़ख्म नए,
अपने हालात ज़माने से छुपाए रखिए ,

याद रखने का हुनर अपनी जगह है लेकिन ,
यहां जीने के लिए बातें भुलाए रखिए ,

इतना आसान नहीं होता बुलंदी का सफ़र,
आप मायूस न हों, जज़्बा बनाए रखिए,

दांव आने भी ज़रूरी हैं ज़माने के मगर ,
कुछ तो सादा दिली भी खुद में बचाए रखिए ,

कितना आसान है लोगों पे हुकूमत करना,
फ़ालतू मुद्दों पे बस उनको लड़ाए रखिए ।

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