रविवार, 24 सितंबर 2017

हों लाख ग़म...

हों लाख ग़म ,चलो खुल के खिलखिलाया जाए,
जलने वालों  को  ज़रा  और  जलाया जाए ,

तुम्हारी मेरी दलीलों  की न  सुनवायी  होगी,
अब  किसी  रोज़  फैसला ही  सुनाया जाए  , 
 
न मुहब्बत,  न शिकायत ही नज़र आती है   ,
बड़ी  कुर्बत है  कुछ  फ़ासला  बनाया जाए ,

माना कि तेरी महफि़ल में कुछ काम नहीं अपना,
अब हम  वो  भी  तो  नहीं  हैं, कि  न  बुलाया जाए,

जो  मेरे   ऐब  गिनाने   का   हुनर   रखते   हैं ,
किसी बहाने सही उन्हें , आइना भी दिखाया जाए,

जिदंगी  बेस्वाद हो जायेगी  बस हक़ीक़त से बनी ,
इसमें थोड़ा ही सही ,नमक ख़्वाबों का मिलाया जाये।
          
                                   निधि बाजपेई 

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