रविवार, 10 सितंबर 2017

माँ

जैसे जैसे उम्र गुज़र रही है,
मुझमें मैं कम हो रही हूंँ,
माँ तू बढ़ रही है ।
सुबह सवेरे बालों की अब,
चोटी बनाना भूल गई हूंँ,
तुम्हारी तरह ही अधखुला जूड़ा बनाए,
बच्चों के पीछे दौड़ रही हूंँ।
मेरे चेहरे पर तुम्हारे चेहरे सी
लकीरें उभरने लगी हैं,
मेरी ऑंखें भी बिल्कुल
तुम्हारी ऑंखों जैसी,
दिखने लगी हैं,
कभी अचानक जब,
यूँही शीशा दिख जाता
चौंक उठती हूंँ मैं,
माँ, तेरा अक्स़ नज़र आता है।
दो अंगुलियों  पर गालों को टिकाए,
ना जाने कहाॅं टकटकी लगाए,
अक्सर खो जाती हूँ,
बिल्कुल जैसे तुम बैठी हो,
फिर तुम ही आती हो कहीं से,
मुझे हिलाकर ये पूछने,
कि ऐसे क्यों बैठी हो?
क्या सोच रही हो?
सम्हल जाती हूंँ अंगुलियों को हटाते हुए,
मुकर जाती हूँ सिर को हिलाते हुए,
कि जैसे मैं तुम नहीं हूँ!
कि जैसे मैं तुम नहीं हूँ!
लेकिन, सच तो यही है कि,
जैसे- जैसे उम्र गुज़र रही है,
मुझमें मैं कम हो रही हूँ,
माँ, तू बढ़ रही है,
माँ,तू बढ़ रही है।

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत गहरी ... हर शब्द दिल में उतरता हुआ ... बेटियां जल्दी ही माँ बन जाती हैं और उसका प्रतिरूप बन के याद आती हैं ... दिल को छूती हुयी रचना ...

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  2. कमाल की रचना आपकीजिन्दगी को सही और सटीक परिभाषित किया है आपने अद्भुत लेखन...लाजवाब...

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