सोमवार, 3 नवंबर 2025

हम जिएं या न जिएं पल तो गुज़र जाते हैं

हम जिएं या न जिएं पल तो निकल जाते हैं ,
रेत की तरह हथेली से फिसल जाते हैं ,

दिल के एहसास को आवाज़ बनाते चलिये,
देखते देखते जज़्बात बदल जाते हैं,
देखते देखते हालत बदल जाते हैं 

हम नहीं होंगे तो फिर किससे शिकायत होगी,
बस यही सोच के हर बार बहल सम्हल जाते हैं जाते है,
 
तुझ पे इल्ज़ाम ही क्यों हो मेरे दर्द-ओ ग़म का,
मेरे हिस्से में लिखे होंगे तो मिल जाते हैं,

हम किसी और से क्यों माॅंगें  खु़दा के होते
उसकी रहमत हो तो खुद रस्ते निकल आते है
उसकी रहमत हो हालात बदल जाते हैं 

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