बुधवार, 7 सितंबर 2011

उन  राहों पे  जाना छोड़ दिया, उन गलियों से मुहंँ मोड़ लिया,
उन दहलीज़ों और दरवाज़ों  से,  हमने  हर  नाता  तोड़ लिया,

हर ख्वाहिश थी उनसे ही जुड़ी  और सपने थे बस उनके लिए,
अब  दिल  में  तमन्ना, आँखों में ख्वाबों को लाना छोड़ दिया,

जब जो भी मिला धोखा ही दिया, मजबूर किया,दिल तोड़ दिया,
अब ग़ैर  तो  ग़ैर  अपनों  से  भी  हमने ,हाँथ मिलाना छोड़ दिया,


उनसे ही थी रंगत महफ़िल में ,उनसे ही थी रौनक दुनिया मेरी,
अब उन अंधियारे  मयखानों की, महफ़िलों में जाना छोड़ दिया,

सौ  बार  गिरे , सौ  बार  उठे  ,सौ  बार  बटोरें  हैं  टुकड़े,
अब ज़ार हुआ,दिल तार हुआ,तो दिल का लगाना छोड़ दिया।

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